अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 20 सितंबर 2025 को H-1B वीज़ा प्रोग्राम में बड़ा बदलाव करते हुए एक नया प्रावधान लागू किया है। इस प्रावधान के तहत अब कंपनियों को हर H-1B वीज़ा आवेदन के लिए $100,000 (लगभग ₹90 लाख) का शुल्क चुकाना होगा। यह फैसला भारतीय आईटी सेक्टर, स्टार्टअप्स और उन सभी पेशेवरों के लिए बेहद अहम है जो अमेरिका में काम करने का सपना देखते हैं।
H-1B वीज़ा क्या है? (H1B Visa Overview)
H-1B वीज़ा एक वर्क वीज़ा है, जिसे अमेरिकी कंपनियां उन विदेशी कर्मचारियों के लिए जारी करती हैं जो स्पेशलिटी ऑक्यूपेशन जैसे IT, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और रिसर्च में काम करते हैं।
- अवधि: 3 साल (3 साल के लिए नवीनीकरण संभव)
- वार्षिक लिमिट: 65,000 वीज़ा + 20,000 मास्टर्स/पीएचडी होल्डर्स के लिए
- भारतीय योगदान: अब तक कुल H-1B वीज़ा धारकों में 70% से ज्यादा भारतीय रहे हैं।
ट्रंप का नया आदेश: $100K H1B Visa Fee
मुख्य बिंदु
- नया शुल्क: अब हर H-1B वीज़ा आवेदन पर $100,000 (₹90 लाख) का अतिरिक्त भुगतान।
- लागू तिथि: 21 सितंबर 2025 से 12 महीने तक लागू, आगे बढ़ाया जा सकता है।
- कंपनियों पर असर: IT, बैंकिंग और कंसल्टिंग कंपनियों पर सबसे ज्यादा प्रभाव।
अमेरिकी सरकार का तर्क
- अमेरिकी ग्रेजुएट्स को ज्यादा अवसर देना।
- H-1B वीज़ा सिस्टम में हो रहे “दुरुपयोग” को रोकना।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू रोजगार को प्राथमिकता देना।
भारतीय IT सेक्टर पर प्रभाव (Impact on Indian IT Sector)
1. नौकरी और करियर पर असर
- नए उम्मीदवारों के लिए कठिनाई: $100K की भारी फीस के कारण कई कंपनियां नए H-1B वीज़ा स्पॉन्सर करने से बचेंगी।
- रीन्यूअल महंगा: जो लोग पहले से अमेरिका में हैं, उनके वीज़ा रीन्यूअल पर भी लागत बढ़ेगी।
- जॉब मोबिलिटी पर असर: कंपनियां अतिरिक्त खर्च के डर से कर्मचारियों को बदलने में हिचकेंगी।
2. भारतीय IT कंपनियों को झटका
- Infosys, Wipro, TCS और Cognizant जैसी कंपनियों के शेयरों में 2-5% तक की गिरावट दर्ज हुई।
- अमेरिका में प्रोजेक्ट्स की लागत बढ़ने से आउटसोर्सिंग पर सीधा असर पड़ेगा।
माइक्रोसॉफ्ट और अमेज़न जैसी कंपनियों पर असर
- Amazon और इसकी क्लाउड यूनिट AWS ने साल 2025 के पहले छमाही में 12,000 से ज्यादा H-1B वीज़ा के लिए मंजूरी पाई।
- Microsoft और Meta Platforms के भी 5,000 से ज्यादा वीज़ा अप्रूवल हैं।
- $100K की नई फीस इन कंपनियों की लागत को लाखों डॉलर बढ़ा देगी।
भारतीय पेशेवरों के सामने विकल्प (Options for Indian Professionals)
- कनाडा और यूके: लचीली वर्क वीज़ा नीति के कारण भारतीय टैलेंट अब कनाडा, यूके, UAE और सऊदी अरब की ओर रुख कर सकता है।
- रिमोट वर्किंग: अमेरिकी कंपनियां भारतीय कर्मचारियों को भारत से ही रिमोट वर्क पर रख सकती हैं।
अमेरिकी राजनीति और H-1B वीज़ा

- उपराष्ट्रपति JD Vance समेत कई रिपब्लिकन नेताओं ने कहा कि अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
- हालांकि ट्रंप ने पहले H-1B प्रोग्राम को “गुड प्रोग्राम” कहा था, लेकिन अब उनका जोर अमेरिकी वर्कफोर्स को बचाने पर है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और स्टार्टअप्स पर असर
- भारत से अमेरिका में हर साल हजारों टेक प्रोफेशनल जाते हैं, जो रेमिटेंस और स्टार्टअप नेटवर्क को मजबूत बनाते हैं।
- नए नियमों से भारतीय स्टार्टअप्स को ग्लोबल टैलेंट एक्सपैंशन में दिक्कत होगी।
निष्कर्ष
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डोनाल्ड ट्रंप का $100K H-1B वीज़ा शुल्क भारतीय टेक्नोलॉजी सेक्टर और प्रोफेशनल्स के लिए बड़ी आर्थिक और करियर चुनौती है।
- जहां कंपनियों को भारी लागत का सामना करना पड़ेगा, वहीं नए और मौजूदा H-1B वर्कर्स को अपने करियर की नई रणनीति बनानी होगी।
- कनाडा, यूके जैसे देशों की ओर ब्रेन ड्रेन बढ़ सकता है।
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